सावन की अंधियारी रात बिजुरिया चमकै आरम्पार – Savan Jhoola

Savan Ki Andhiyari Raat Bijuriya Chamkai Arampar

सावन की अंधियारी रात बिजुरिया चमकै आरम्पार

घुप्प अंधेरी नभ में छाई

कारी घटा बड़ी टकराई

मानों है रही बड़ी लड़ाई

गहर गहर के कारे बादर गरजें बारम्बार ।

बिजरी कौंध रही मतवारी

अँखियन चौंधा दै रही भारी

थिर न रहै ऐसी सटकारी

बड़ी-बड़ी बूंदन मेहा बरस्यौ है गई धारमधार ।

डरप रही इक ब्रज की नारी

ह्वाई देख रहे गिरिधारी

मन में रीझ बहुत भई भारी

श्री मोहन ने बांह गही जब कीनी तारामतार ।

कामर की हरी करी खोइया

एकइ में गोरी औ रसिया

लाजन गोरी रोकै हँसिया

बाहर भीतर रस बरसै झर लग गई झारमझार ।

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