मोरा कोहंक कोहंक के बोलें – Savan Jhoola

Mora Kohak Kohak Ke Bole Aai Savan Ki Bahar

मोरा कोहंक कोहंक के बोलें, आई सावन की बहार।

नभ में घुर रहे बादर कारे

जैसे ऊपर बजें नगारे

देख कें मोरा पंख पसारे

झूम-झूम के नांच रहे हैं मंदी परै फुहार ।

ऐसे में निकसे पिय प्यारी

मन में लहर उठी मतवारी

लता-पतन की झूमन न्यारी

पटुका और चुनरिया फहरै सीरी चल रही ब्यार ।

वन विहरें रस भीनी जोरी

सुन्दर नवल किशोर किशोरी

चले जात गहवर वन ओरी

मधु टपकाय लता फूलन ते बरसावै रसधार ।

कबहूँ जावै मोर-कुटी चढ़

कबहूँ देखेँ चढ़ै मान-गढ़

कबहूँ गलबैया विलास-गढ़

धन्य-धन्य ब्रह्माचल विहरें जहां युगल सरकार।।

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