कैसी ऋतु सावन की आई, जामें झूलन की बहार – Savan Jhoola

Kaisi Ritu Savan Ki Aai Jame Jhulan Ki Bahar

कैसी ऋतु सावन की आई, जामें झूलन की बहार ।

कोयल कैसी गाती डोलें

मोरा नाचें पंखन खोलें

दादुर और चकोरा बोलें

पीउ पीउ ये रटें पपैया झींगुर की झनकार ।

इन्द्र-धनुष ऊग्यो रंगीलो

बादर झमक चढ्यो गरबीलो

मन्द-मन्द गरजै बरसीलो

नहनी-नहनी बूंदरिया की ठंडी परै फुहार ।

ऐसे वचन कहैं मनमोहन

चलीं छबीली चन्द लजोहन

जाय छिप्यौ बदरी के गोहन

रेशम की डोरन ते झूला परयो कदम की डार ।

झूला नव फूलनहि संवारयो

फूलन सब सिंगारहि धारयो

गोद उठाय प्रिया बैठारयो

दोनू झूला गावें बरसै गहवर रस की धार ।

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