तेरे मन में कहा बसी है, मेरौ मारग.. – Dadhi Madhuri

Tere Man Mei Kaha Basi Hai, Mero Marag Rokyo Aay

तेरे मन में कहा बसी है, मेरौ मारग रोक्यो आय ।

न कोऊ और पास ह्याँ री

घिरी मैं इकली मतवारी

मधुर मुसक्यावे गिरिधारी

सिर ऊपर मटकी दधि की मैं निकसूँ कैसे हाय ।

हमारौ दान देओ प्यारी

यहाँ की रीति यही न्यारी

चतुर तुम हो बिछुवा वारी

बहुत दिना में आज हमारे हाथ परी मन भाय ।

सांवरे जोरूं तेरे हाथ

अकेली और न कोऊ साथ

ऊजरौ ना होवैगो माथ

या ब्रज के सब हैं उत्पाती लाज हमारी जाय ।

लाज ते कहा सरैगो काम

दान दधि को दै मांगै श्याम

होय यहाँ दाता ही कौ नाम

इतनी सूम बनें मत गोरी दान देत घबराय ।

बनाओ बात बहुत तुम लाल

पिटे तुम मैया ते हो काल

न छूटे इतने हू पै जाल

मात-पिता गोरे तुम कारे, कुल को रहे लजाय ।

पिता माता को देति हवाल

डरै ना नेंकहु अपनौ ख्याल

बजावै री क्यों इतनों गाल

आज लेऊंगों दान यहीं क्यों आँखें रही दिखाय ।

चली ग्वालिन बच कै कतराय

पकर लई मोहन नें झट जाय

छुड़ाई बांह सखी इठलाय

झटका पटकी मटकी फूटी दही चल्यो ढरकाय ।

गली यह धन्य साँकरी खोर

मिले ग्वालिन को श्याम किशोर

चली गहवर को लै चित्तचोर

धन्य धन्य ब्रजधाम जहां ऐसो आनन्द दरसाय ।

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